क्यो उछलने लगा जूता

राजनेताओं के प्रति विरोध जताने की कैसे बदली आम जनता की मानसिकता
विरोध जताने का सबसे उपयुक्त मौसम चुनाव ही है। यही वह समय है जब नेता और आम जनता एक दूसरे के मुखातिब होते हैं। वरना वोट लेने के बाद नेता गायब और उन्हें ढूंढऩे में ही जनता कोपांच साल का वक्त गुजारना पड़ता है। अब जब मौसमी पारे से ज्यादा राजनैतिक गर्मी की तपिश महसूस की जाने लगी है, तो जनता जनार्दन का भी गर्म होना स्वाभाविक है। वैसे तो आजादी के बाद से विरोध जताने के लिए जनता ने तमाम रास्ते अख्तियार किए, लेकिन कुछ भी हासिल नहीं हुआ। इसलिए अब हक की लड़ाई खिसियाहट में बदल गयी है और समय बदलने के साथ विरोध का तरीका भी बदल रहा है। भले ही विरोध के नये प्रतीक जूते को कहीं से भी उचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन सवाल उठता है कि विरोध दर्ज कराने के लिए हाथ में जूता उठा लेने की मानसिकता आम जनता में कैसे पनपी। कौन है इसका जिम्मेदार? देश में आजादी के पहले से विरोध आंदोलनों का सिलसिला चल रहा है। अंग्रेजों से आजादी पाने के लिए भी तमाम तरह के विरोध आंदोलन छेड़े गये। गांधी जी ने सत्याग्रह और नमक आंदोलन के जरिए अंग्रेजों की मुखालफत की। देश के क्रांतिवीरों ने अंग्रेजी हुकूमत का विरोध दर्ज कराने के लिए एक से एक अनोखी तरकीबें अपनाईं। ये सब विरोध के तरीके कामयाब हुए और आजादी मिली। देश आजाद हो गया, लेकिन जूता पैरों में ही कैद रहा। वैसे जूता बड़ा ही सहनशील होता है। वह इन साठ सालों में अपनी जगह से डिगा नहीं और पूरी ईमानदारी से पैरों में ही पड़ा रहकर धूल-मिटटी सहता रहा। मंदिर-मस्जिद की चौखट के बाहर उतरकर अपनी उपेक्षा सहता रहा। आम जनता लुटती, पिटती, घिसटती, कुढ़ती और भूखी रही लेकिन जूता पूरी वफादारी से पैरों में ही पड़ा रहकर साथ निभाता रहा। आम जनता अपनी फरियादें लेकर शासन, प्रशासन और सरकारों की चौखट पर पहुंचती रही। इस चक्कर में जूते घिस गये, फिर भी वह पैरों से नहीं उतरा। ऐसा लगा कि जनता से ज्यादा समझदार जूता है। वह सब कुछ जानता है। वह जानता है कि हमारी जरूरत अमीर-गरीब, बेइमान, ईमानदार सभी को है। इसीलिए वह सभी के साथ-साथ चलता रहा। आम पब्लिक ने अपनी आवाज बुलंद करने और विरोध जताने के लिए हड़ताल, भूख हड़ताल, धरना, प्रदर्शन, अनशन, क्रमिक अनशन, रेल रोको, सप्लाई रोको, सड़क जाम, पुतला फूंको, नारेबाजी, जैसे तमाम तौर-तरीके अख्तियार किए। समय-समय पर इन आंदोलनों के जरिए सरकारों को झुकाया भी गया, लेकिन हर पांच साल बाद वोट मांगने के लिए जनता के पास पहुंचने वाले नेता आम जनता का दिल नहीं जीत पाए और जनता का किसी न किसी मुद्दे पर विरोध बरकरार बना रहा। तमाम मुद्दों पर और पूरे सिस्टम के खिलाफ विरोध करते-करते आंदोलन के तमाम तरीके आउट डेटेड हो गये। इन विरोध आंदोलनों का असर होने के बजाय शासन-प्रशासन के लोग किसी भी तरह आंदोलनकारी को जूस पिलाकर आंदोलन खत्म करवाने की फिराक में लगे रहे, लेकिन नौकरशाहों व नेताओं ने खराब हो चुके सिस्टम को ठीक करने में कोई दिलचस्पी नहीं ली। इसी का नतीजा यह रहा है कि आउट डेटेड तरीकों को छोड़ आम जनता भी विरोध करने का नया फंडा ढंढऩे लगी। इसी बीच दिसम्बर 2008 को इराकी पत्रकार अल जैदी ने एक प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान तत्कालीन अमेरिकी president जॉर्ज बुश पर जूता उछाल दिया। वह इराक में अमेरिकी फौजों की तैनाती का विरोध कर रहा था। बुश ने तो सिर झुकाकर खुद को जूते से बचा लिया, लेकिन इस घटना ने पूरी दुनिया को विरोध जताने का नया तरीका बता दिया। इसी के बाद चीन के प्रधानमंत्री पर फरवरी 2008 में केंद्रीय यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड में एक समारोह के दौरान जूता चला। उन्हें अपना भाषण बीच में ही रोक देना पड़ा। दुनिया के बड़े मुल्कों में जूता चलने से विरोध करने का यह फार्मूला भारतीय जनता जनार्दन को बहुत हिट लगा। अब जब भारत में चुनाव का मौसम आ गया तो जनता की नींद वोट देने के लिए हर पांच साल की तरह फिर खुल गई। जनता भी जानती है कि विरोध जताने का सबसे उचित चुनावी मौसम है। इसीलिए बासठ साल तक पैरों में पड़ा रहा जूता भी बाहर निकल पड़ा है। अब जूता बाहर निकलेगा तो हाथ में आएगा ही। हाथ में आने पर वह किसकी तरफ चलेगा, यह जनता ही तय करेगी। जाहिर बात है कि आम पब्लिक जिससे ज्यादा ऊबी व परेशान होगी, वही जूते का शिकार होगा। अमेरिका में इस विरोध के तरीके की शुरूआत एक पत्रकार के हाथों हुई थी, सो भारत में भी इसकी शुरूआत पत्रकार जरनैल सिंह के हाथों हुई। यानी अमेरिका में जैदी था तो-भारत में जरनैल। मौका था देश के गृहमंत्री की प्रेस कान्फ्रेंस का। मुद्दा था सन् 84 के दंगों के आरोपी दो सांसदों को फिर से चुनाव मैदान में उतारने का। तमाम तरह के विरोध करने के बाद भी कांग्रेस ने जब इनकी उम्मीदवारी वापस नहीं ली, तो विरोध का जूता पत्रकार ने गृहमंत्री पर उछाल दिया। यहां भी बुश की तरह चिदंबरम भी जूते की चोट से बच गये, लेकिन जूता एक ओर गिरकर उस समय खामोश हो गया। लेकिन विरोध का यह तरीका कारगर रहा और बाद में कांग्रेस को उन दोनों मौजूदा सांसदों जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार के टिकट काटने के लिए मजबूर होना पड़ा। बुश पर जूता चलाने वाले जैदी को तो तीन साल की सजा हो गई है, लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में जूता चलाने वाले पत्रकार को चिदंबरम ने माफ कर दिया। यह दरियादिली नहीं, विरोध के तरीके के आगे उनकी शर्मिंदगी थी। यह जूता किसी व्यक्ति पर नहीं सरकार और भ्रष्ट सिस्टम पर उछला था। इसलिए इस खामोश जूते के पीछे छिपे तूफान को समझने की जरूरत है। इसके पीछे है पब्लिक के जज्बातों और आजाद नेताओं को सबक सिखाने का तूफान। सरकारी महकमों में भ्रष्टïाचार और इंसाफ मांगने की डगर पर नाइंसाफी के डर का तूफान। वक्त के साथ-साथ विरोध का तरीका भी बदल चुका है। इसलिए बेहतर है कि सफेद कपड़ों में कालिख लिये चेहरे अब भी जूते की भाषा समझ लें। जूता जनता से ज्यादा समझदार है। इसलिए नेताओं को सुधरने का मौका दे रहा है। अगर अब भी नहीं समझे तो यह अपनी समझदारी छोड़ सरकार व उसके तंत्र को समझाने में लग जायेगा। कांग्रेस ने पार्टी मुख्यालय पर होने वाली प्रेस कान्फ्रेंसों में सेवादल के कार्यकर्ताओं को तैनात करने का फैसला लिया है। ताकि इस तरह की घटनाएं दोबारा न हो सकें। जरूरत इस तरह की घटनाएं रोकने के इंतजाम करने ही नहीं है। बल्कि जरूरत है कि पूरे सिस्टम को ठीक किया जाए, ताकि इस तरह की घटनाओं के हालात ही पैदा न हो सकें। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भी कांग्रेस के सांसद नवीन जिंदल की चुनावी सभा में एक रिटायर्ड शिक्षक ने माननीय पर जूता उछाल दिया। वह भी पार्टी की नीतियों से खफा था। सरकार और सरकारी तंत्र को छोडि़ए। अब यह जूता सरकार बनाने की जुगत में लगे पीएम इन वेटिंग पर तक उछल पड़ा है। अबकी विरोध का प्रतीक जूता नहीं चप्पल मध्य प्रदेश के कटनी जिले में लालकृष्ण आडवाणी पर उछाल दी गई। अब चप्पल हिंदू संस्कृति और साधू संतों की अलंबरदार पार्टी के नेता पर उछलनी थी, तो उसने यहां पार्टी के अनुसार ही रंग-रूप बदल लिया। पहली बात यह जूता नहीं चप्पल थी। दूसरी चमड़े की नहीं लकड़ी की खड़ाऊं जैसी थी।यह चप्पल आम जनता के ही नुमाइंदे पार्टी के कार्यकर्ता ने अपने नेता पर उछाली थी। उसका कहना था कि मैंने चप्पल नहीं अपने पिता जी की खड़ाऊं उछाली है। यह काम मैंने ईश्वरीय प्रेरणा से किया है, क्योंकि आडवाणी नकली लौह पुरुष हैं। उनकी कथनी और करनी में अंतर है। वह राम की बात करते हैं और जिन्ना की मजार पर जाते हैं। जबसे देश की राजधानी दिल्ली में पत्रकार का जूता उछला है, तबसे चुनाव के मौसम में नेता भी सचेत हो गये हैं। इसलिए जूता बयार रोकने की तरकीबें की जाने लगी हैं। अब उन्हें भी एहसास तो चला है कि पैरों का जूता हाथ तक पहुंचने लगा है, इसलिए कहीं भी और कभी भी चल सकता है। अभी कुछ दिन पहले तो पीएम इन वेटिंग अपने चुनावी दौर पर कोयंबटूर गये, तो प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान मीडिया कर्मियों के जूते-चप्पल बाहर ही उतरवा दिए। इसका मतलब यह हुआ कि भारत में जूता-चप्पल चलने की तीन ताबड़ तोड़ घटनाओं ने नेताओं को दहशत में डाल दिया है। कोई बड़ी बात नहीं कि चुनाव खत्म होते-होते इस तरह की घटनाएं कहीं और भी हो जाएं। क्योंकि यह सस्ता प्रचार पाने का तरीका ही नहीं विरोध जताने का सबसे लेटेस्ट मॉडल भी है। ये तरीका भले ही गलत हो लेकिन लोगों के अंदर भरी आग को साफ-साफ दिखाता है। आखिर कैसे बुझेगी लोगों के गुस्से की आग? क्योंकि बदल रहा है आम जनता के विरोध का तरीका।
Comments
welcome and best wishes
dr.bhoopendra
चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है ,लेखन के लिए शुभ कामनाएं ............
इधर से गुज़रा था, सोचा, सलाम करता चलूंऽऽऽऽऽऽऽऽ
ये मेरे ख्वाब की दुनिया नहीं सही, लेकिन
अब आ गया हूं तो दो दिन क़याम करता चलूं
-(बकौल मूल शायर)
मयूर दुबे
अपनी अपनी डगर