वह अतुल जी का दौर था, यह जमाना राजुल लाला का
वैसे तो पूरे देश से खोजी पत्रकारिता की विधा पूरी तरह से खत्म हो चुकी है लेकिन बागी बलिया के दो पत्रकारों ने यूपी बोर्ड परीक्षा का पेपर लीक होने की खबर प्रकाशित करके अपनी जिन्दादिली का ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता के 'जिन्दा' होने का भी सबूत दिया है। दूसरी तरफ अखबार का संपादक मंडल शायद यह भूल गया कि पत्रकारिता का जन्म ही सत्ता का विरोध करने के लिए हुआ था। दरअसल, आज के जमाने में संपादक जैसी व्यवस्था को मार कर उन्हें 'मैनेजर' बना दिया गया जो सत्ता से हाथ मिलाकर अपने संस्थान के लिए धन जुटाने की व्यवस्था में ही लगे रहते हैं। अतुल माहेश्वरी के जिन्दा रहने तक अमर उजाला अखबार ने सत्ताओं का विरोध करते हुए हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने के तमाम इतिहास भी रचे हैं। उस समय संपादक मंडल को भी सत्ता के विरोध में खबरें प्रकाशित करने के अंदरूनी निर्देश हुआ करते थे। अमर उजाला के संस्थापक संपादक डोरी लाल अग्रवाल जी, अशोक अग्रवाल जी और अनिल अग्रवाल 'भैय्यू जी' से नजदीकी होने के बावजूद सपा सरकार के खिलाफ ख़बरों का प्रकाशन नहीं रुका। इसी वजह से 1994 में उत्तर प्रदेश के तत्का...


