प्रभाष जी की सीख- तेवर के साथ जोरदारी से लिखो


बात उस दौर की है जब मैं पत्रकारिता का ककहरा सीखने के बाद भारतीय सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार और घोटालों की बखिया उधेड़ रहा था। उसी समय प्रभाष जी से मुलाकात और उनकी सीख ने पत्रकारिता के जीवन में आगे बढ़ने का हौसला दिया। उनका मंत्र 30 साल के प्रोफेशन में हमेशा याद रहा है और आगे भी रहेगा। वे खुद तो तेवर के साथ जमकर लिखते ही थे और मंत्र के नाम पर मेरे जैसे लोगों को सीख भी देते थे कि अगर किसी खबर को लिखना शुरू करो, तो फिर चाहे जितने दबाव आएं, लेकिन लिखना बंद मत करो। दबाव में आकर खबर बंद करने का मतलब है भ्रष्टाचारियों और घोटालेबाजों के सामने नतमस्तक हो जाना। उन्होंने यह भी सीख दी थी कि खबर रोकने का दबाव आने पर लिखना बंद करने के बजाय और तेवर के साथ जोरदारी से लिखना चाहिए। प्रभाष जी की यह सीख मुझे कब मिली, यह जानने के लिए थोड़ा सा पीछे जाना पड़ेगा।
बात सन 1989 की है। उस समय अपने तीखे तेवरों की वजह से पहचान बना चुके दिल्ली से प्रकाशित साप्ताहिक अखबार 'चौथी दुनिया' का मैं कानपुर से स्ट्रिंगर हुआ करता था। पत्रकारिता जीवन में आने के दो-तीन साल बाद ही मुझे इस धमाकेदार बैनर का सानिध्य मिला और हाथ लगी कानपुर स्थित सेना के केंद्रीय आयुध भंडार में व्याप्त घोटालों और भ्रष्टाचार में शामिल दिल्ली तक बैठे सैन्य अधिकारियों की मिलीभगत की स्टोरी। मैंने यह स्टोरी लिखकर 'चौथी दुनिया' को भेज दी। भ्रष्टाचार की परत दर परत खोलने के चक्कर में यह स्टोरी इतनी लंबी हो गई कि संस्थान ने इसे आठ किश्तों में बांटकर पहले पेज पर क्रमश: करके बॉटम में छापना शुरू किया।
अभी दो ही किश्तेंं छपी थी कि पता नहीं क्यों स्टोरी रोक दी गई। मैं दिल्ली आया और अखबार के तत्कालीन सलाहकार संपादक संतोष भारतीय जी (संयोग से अब संपादक हैं) से मौसम विहार वाले घर पर जाकर मिला और पूरी बात बताई। उसी दौरान प्रभाष जी से मेरी मुलाकात उस समय जनसत्ता में रहे श्री शंभूनाथ शुक्ला ने कराई। उन्हें अपनी सारी व्यथा बताकर दो छपी हुई किश्तें दिखाईं तो वे स्टोरी के सबूत देखकर बोले कि अगर वे नहीं छापते हैं तो आगे की स्टोरी मैं छापूंगा। बहरहाल संतोष जी ने मेरी बात सुनने के बाद भरोसा दिया कि तुम जाओ और तुम्हारी पूरी स्टोरी छपेगी। दो हफ्ते के ब्रेक के बाद बाकी की किश्तें पहले की तरह लगातार पहले पन्ने पर ही बॉटम के रूप में छपीं और जमकर तहलका मचा। जांच हुई, कार्रवाई हुई और संबंधित डिप्टी कमांडर कर्नल को कोर्ट मार्शल तक हुआ। इसके कुछ दिन बाद फिर इसी सैन्य संस्थान पर एक और घोटाला सबूतों सहित पता चला लेकिन तब तक 'चौथी दुनिया का प्रकाशन बंद हो चला था। तब फिर मैं प्रभाष जी से मिला और 'चौथी दुनिया' में प्रकाशित सभी किश्तें दिखाकर नयी स्टोरी दिखाई। तब मेरी पीठ थपथपाते हुए आदरणीय प्रभाष जी बोले ठीक है, चौथी दुनिया में ना सही जनसत्ता में तुम्हारी स्टोरी छपेगी, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ जो तुमने मुहिम छेड़ी है, उसे ठिठकने नहीं दूंगा। मेरी यह स्टोरी जनसत्ता में 14 जनवरी 1991 को 'माल के बजाय ईंट पत्थर' शीर्षक से छपी।
तो यह था प्रभाष जी का तेवर। उनका कहना था कि अगर तुम्हारी यह स्टोरी नहीं छपती तो तुम हतोत्सहित हो सकते थे और काम करने का जज्बा कम हो सकता था। ईश्वर उनकी आत्मा को श्रद्धांजलि दे और यही चाहूंगा कि उनकी यह सीख मेरे साथ आगे भी रहकर मेरे तेवर और जज्बे को मंजिल तक पहुंचाए।

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