वह अतुल जी का दौर था, यह जमाना राजुल लाला का
वैसे तो पूरे देश से खोजी पत्रकारिता की विधा पूरी तरह से खत्म हो चुकी है लेकिन बागी बलिया के दो पत्रकारों ने यूपी बोर्ड परीक्षा का पेपर लीक होने की खबर प्रकाशित करके अपनी जिन्दादिली का ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता के 'जिन्दा' होने का भी सबूत दिया है। दूसरी तरफ अखबार का संपादक मंडल शायद यह भूल गया कि पत्रकारिता का जन्म ही सत्ता का विरोध करने के लिए हुआ था। दरअसल, आज के जमाने में संपादक जैसी व्यवस्था को मार कर उन्हें 'मैनेजर' बना दिया गया जो सत्ता से हाथ मिलाकर अपने संस्थान के लिए धन जुटाने की व्यवस्था में ही लगे रहते हैं।
अतुल माहेश्वरी के जिन्दा रहने तक अमर उजाला अखबार ने सत्ताओं का विरोध करते हुए हिंदी पत्रकारिता को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने के तमाम इतिहास भी रचे हैं। उस समय संपादक मंडल को भी सत्ता के विरोध में खबरें प्रकाशित करने के अंदरूनी निर्देश हुआ करते थे। अमर उजाला के संस्थापक संपादक डोरी लाल अग्रवाल जी, अशोक अग्रवाल जी और अनिल अग्रवाल 'भैय्यू जी' से नजदीकी होने के बावजूद सपा सरकार के खिलाफ ख़बरों का प्रकाशन नहीं रुका। इसी वजह से 1994 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने अमर उजाला के खिलाफ 'हल्ला बोल अभियान' तक चलाया था लेकिन अमर उजाला ने घुटने नहीं टेके और मुलायम सिंह को माफ़ी मांगकर 'हल्ला बोल अभियान' वापस लेना पड़ा।
बात उस समय की है जब तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने 11 फरवरी, 1995 को हमीरपुर जिले से अलग करके महोबा को पूर्ण जिला बनाया। नए जिला मुख्यालय पर भवन निर्माण और ढांचागत सुविधाओं के निर्माण कार्यों में जबरदस्त धांधलियों को लगातार वहां के ब्यूरो चीफ अवधेश दुबे उजागर कर रहे थे। इसी बीच 11वीं लोकसभा के लिए 1996 में चुनाव हुए। महोबा के पहले डीएम उमेश सिन्हा ने बदले की भावना से अवधेश दुबे को सबक सिखाने के लिए जबरदस्त जाल बुना। डीएम ने कुछ बैलेट पेपर अवधेश दुबे के पास से बरामद देकर दिखाकर उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज करके रातो रात गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। इस मामले में अतुल जी ने जबरदस्त स्टैंड लिया। उन्होंने मुझे इस मिशन के लिए चुना और इस हिदायत के साथ भेजा कि इस पूरे मामले की अपने तरीके से जांच-पड़ताल करो।
दरअसल, महोबा नया जिला बना था इसलिए जिला निर्वाचन अधिकारी का चार्ज जिलाधिकारी हमीरपुर के पास और महोबा डीएम के पास सहायक निर्वाचन अधिकारी का चार्ज था। मैं महोबा जिला प्रशासन की एफआईआर कॉपी के साथ हमीरपुर डीएम से मिला। एफआईआर में दर्ज जिन नंबरों के बैलेट पेपर चोरी करने के आरोप में अवधेश दुबे को गिरफ्तार करके जेल भेजा गया था, उन नंबरों के बैलट पेपर चोरी होने की खबर सुनकर डीएम हमीरपुर वीपी सिंह को खुद की नौकरी खतरे में पड़ती दिखाई देने लगी। उस समय पोलिंग पार्टियां रवाना हो चुकी थीं और दूसरे दिन सुबह से मतदान होना था। डीएम हमीरपुर ने रातों रात सारे दस्तावेज खंगाले और चोरी की खबर नकारते हुए बताया कि उक्त नंबर के बैलेट पेपर हमीरपुर विधानसभा क्षेत्र के पोलिंग बूथ के लिए आवंटित किए गए हैं। उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए रात 2 बजे मुझे अपने साथ उस पोलिंग बूथ पर लेकर गए और उक्त नंबर के बैलट पेपर दिखाए। चुनाव के दिन जब उक्त बैलेट पेपर मतदान में इस्तेमाल किए गए तो डीएम हमीरपुर को अपनी नौकरी बचाने के लिए लिखित रूप में इसकी तस्दीक करनी पड़ी।
इसके बाद सवाल खड़ा हुआ कि जिन बैलेट पेपर का इस्तेमाल मतदान में हुआ तो उन्हीं नंबरों के बैलेट पेपर की बरामदगी महोबा प्रशासन ने अवधेश दुबे के पास से कैसे दिखाई। जांच-पड़ताल में मिले तथ्यों से अतुल जीको अवगत कराया तो उन्होंने मुझे व्यक्तिगत हलफनामा के साथ डीएम हमीरपुर का लिखित बयान कोर्ट में दाखिल करने को कहा, ताकि अवधेश दुबे की जमानत हो सके। यह अतुल जी का जज्बा था कि उन्होंने आखिरी दम तक अपने सहयोगी अवधेश दुबे की लड़ाई लड़ी और महोबा डीएम खुद अपने बुने जाल में फंस गए। महोबा प्रशासन की साजिश का खुलासा होने के साथ ही बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से अवधेश दुबे को जमानत भी मिल गई। अब दुनिया में न अतुलजी हैं और न अवधेश दुबे लेकिन दोनों को सलाम...
बलिया के बागी तेवर और मौजूदा संपादक मंडल की प्रशासन के सामने दिख रही लाचारी पर पत्रकारिता की गहरी समझ रखने वाले अतुल जी का ज़माना इसलिए याद आ गया क्योंकि उन्होंने अपने सहयोगियों को कंधे से कंधा मिलाकर सत्ता के खिलाफ लड़ाई लड़ने में साथ दिया। उन्होंने ही कस्बाई और ग्रामीण पत्रकारिता को बढ़ावा दिया और गांव-देहात के पत्रकारों के खिलाफ साजिशों के खिलाफ खड़े होते थे जिससे छोटे से छोटे साथी का आत्म बल मनोबल बढ़ता था जो मौजूदा बलिया पेपर लीक प्रकरण में नहीं दिखाई दे रहा है।कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वह जमाना और था, यह जमाना और है।

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